अधूरी ख्वाहिशें-5

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अधूरी ख्वाहिशें-5

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे मुझे दिखाने के बहाने राशिद ने अहाना का योनिभेदन किया था. लेकिन वो नजारा देख कर मेरी कामुकता पूरी उफान पर आ गयी. तभी एक दिन घर में मैं अपनी बहना के साथ अकेली रह गयी तो मेरी बहन ने मुझे बिना मर्द के योनि की खुजली मिटाने का तरीका सिखाने का फैसला किया.
अब आगे पढ़िये-

थोड़ी देर बाद दुपट्टे में कुछ लिये वापस लौटी तो सीधे घर को अच्छी तरह लॉक करने का हुक्म सुना दिया कि कोई बाहरी एकदम से टपक न पड़े।
यहां यह बता दूँ कि भले उस घर में तीन परिवार रहते थे, लेकिन सबके हिस्से बंटे हुए थे और जब प्राइवेसी चाहते, अपने हिस्से को किसी भी आवागमन से सुरक्षित कर सकते थे।

सब कुछ अच्छे से बंद कर के हम अपने कमरे में आ गये तब उसने दिखाया कि वह किचन से दो लंबे बैंगन उठा लाई थी। एक तो लंबा और मोटा सा था जबकि दूसरा उसका आधा ही था।

फिर मेरे देखते देखते उसने अपने सारे कपड़े उतार डाले और उस रात की तरह नग्न हो गयी।

“सुन.. यह जो बैंगन है, यही समझ लड़के की मुनिया है और यही मेरी मुनिया की खुजली मिटायेगा, लेकिन यह भी तब जायेगा जब अंदर चिकनाई हो।”

“अब यहां कैसे चिकनाई लाओगी.. वहां तो राशिद भाई थे।”
“यहां तू है न.. आज तू राशिद बन जा।”
“मम-मैं.. कैसे?”
“देख रजिया.. खुजली तो तुझे भी होती है, तू राशिद के रोल में आ जा, हम दोनों की खुजली मिट जायेगी।”
“मुझे कब खुजली होती है?” मैंने सख्त हैरानी से उसे देखा।

“जिस रात मैंने और राशिद ने अपनी खुजली मिटाई थी और नीचे वापस आये थे, तो मैं तो चैन से सो गयी थी और हमेशा की तरह सुबह उठ गयी थी, लेकिन तू सोती रही थी ग्यारह बजे तक.. क्यों?”

“क्योंकि मैं रात को सो नहीं पाई थी.. नींद ही सुबह आई थी, तो देर तक ही सोऊंगी न।”
“क्यों.. क्यों नहीं नींद आई थी?”
“वव-वह…” जवाब देने में मैं अटक गयी और बेबसी से उसे घूरने लगी।

“क्योंकि जो तुमने देखा था वह तुम्हारे दिमाग में नाचता रहा था और अपने पूरे जिस्म में एक अजीब सी नशे भरी अकड़न और बेचैनी महसूस होती रही थी रात भर.. जिसे तुम न समझ सकती थी, न बयान कर सकती थी।”
मैं चुप उसे देखती रही, लेकिन वह मेरी खामोशी से मेरी सहमति का अंदाजा लगा सकती थी।

“वही होती है मुनिया की खुजली.. अभी थोड़ा वक्त गुजरने दो, फिर तुम्हें महसूस होने लगेगी और तब देखना कैसे किसी चीज की रगड़ तुम्हारी खुजली को शांत करती है।”

मेरे होंठ और गला सूखने लगे और अहाना ने मेरा दुपट्टा गले से निकाल कर किनारे डाल दिया। फिर चाक से पकड़ कर कुर्ता ऊपर खींचा.. मेरे हाथ स्वमेव ही ऊपर उठते चले गये, जिससे कुर्ता सर से होता बाहर निकल गया।
मैं महसूस कर रही थी कि मुझमें प्रतिरोध करने जैसी कोई भावना नहीं थी। आखिर सामने मेरी वह बहन थी जो मेरे साथ ही बड़ी हुई थी और मैं जिस पर सबसे ज्यादा भरोसा करती थी।
फिर उसने मेरी ब्रा भी खोल कर हटा दी।

अब मेरे दूध.. मेरे शरीर का ऊपरी हिस्सा उसी की तरह आवरणरहित था। मैंने हम दोनों के दूध की तुलना की.. मेरा साइज जहां बत्तीस डी था, वहीं उसका साईज चौंतीस बी था।
इसके अलावा उसकी घुंडियां बाहर निकली हुईं और बड़ी थीं जबकि मेरी घुंडियां छोटी और पिचकी हुई थीं। कुछ हद तक मुझे हीनता का अहसास हुआ।
“मेरी छोटी हैं।” मैंने थोड़ी मायूसी से कहा।
“हां.. जब तक इस्तेमाल होना नहीं शुरू होतीं तब तक छोटी रहतीं, इस्तेमाल होने लगेंगी तो बढ़ जायेंगी।” अहाना ने उन्हें सहलाते हुए कहा।

ऐसा नहीं था कि उसका हाथ ‘वहां’ पहली बार लगा हो, लेकिन आज अजीब सा महसूस हुआ.. जैसे कोई मस्ती भरी सनसनाहट पूरे जिस्म में दौड़ गयी हो।

जबकि अहाना ने दोनों हाथ नीचे करके सलवार का जारबंद खोल दिया और मुझे कंधों से दबाते हुए पीठ के बल लिटा दिया और मेरी पैंटी में उंगलियां फंसाते उसे यूँ नीचे किया कि सलवार समेत उतरती चली गयी।

अब हम दोनों बहनें एक जैसी अवस्था में थीं.. एकदम नग्न। कपड़े का एक रेशा तक नहीं था हमारे जिस्म पर।

वह मेरे दाहिनी तरफ मुझसे सट कर लेट गयी और अपनी तर्जनी उंगली मेरे गले से ले कर सीने तक फिराने लगी। जब उसकी उंगली मेरी घुंडियों से छुई तो अजीब सी मादक गुदगुदी नीचे योनि तक महसूस हुई।

मैं चाह रही थी कि वह वहां और टच करे लेकिन वह उंगली नीचे उतार ले गयी और पेट से होती मेरी योनि पर ले जा कर ऐसे दबाई कि मेरी योनि की फांक उसकी उंगली के नीचे आ गयी और ऊपर का अंगुल आधे इंच तक अंदर धंस गया।

मुझे एकदम करेंट सा लगा और मैं तड़प गयी.. मैंने टांगें सिकोड़ते हुए उसका हाथ जोर से हटा दिया और वह खिलखिला कर हंस पड़ी- हटाने की नहीं होती जानेमन… जो महसूस करोगी बस वही है खुजली। तुम्हारी घुंडियां छोटी हैं न.. अभी देखना।
फिर वह शरारत से मुझे देखती मेरी दोनों घुंडियों को बारी-बारी जीभ की नोक से छेड़ने लगी और उसके हर स्पर्श पर मेरे जिस्म में तेज करेंट सा लगता।

और मैं देख रही थी अपनी सिकुड़ी पिचकी घुंडियों के तंतुओं में आते तनाव को.. वे ठोस हो रही थीं, बाहर उभर रही थीं और नुकीली हो रही थीं। फिर मेरे देखते-देखते वे एकदम तन गयीं और अहाना एक घुंडी को चुटकी से मसलती दूसरी को अपने मुंह में लेकर ऐसे चुसकने लगी जैसे बच्चे दूध पीते हैं।

“अच्छा लग रहा है न.. मजा आ रहा है न?” बीच में ही उसने पूछा।
“हां!” जवाब देते वक्त मेरी आंखें मुंदी जा रही थीं मजे से और मैं न चाहते हुए भी उसके सर को सहलाने लगी थी।
“अब देख तेरी मुनिया में चिकनाई आई या नहीं।”

करीब पांच मिनट मेरे दोनों दूध पीने के बाद उसने सर उठाया और पहले की तरह मेरे साईड में हो गयी, जबकि अब तक वह मुझ पर लदी हुई थी।

मैं कुहनियों के बल थोड़ा उठ कर देखने लगी, हालाँकि उस हालत में मुझे सिवा अपनी योनि के आसपास फैले काले काले बालों के और कुछ नहीं दिख रहा था। लेकिन उसने अपनी बीच वाली उंगली थोड़ा धंसाते हुए मेरी योनि में फिराई और एक चटकन सी मेरी रगों में दौड़ गयी। ऐसा लगा जैसे पूरा बदन गनगना कर रह गया हो।

जबकि वह मेरी आंखों के आगे अपनी भीगी चमकती उंगली नचा रही थी.. उसने उंगली और अंगूठे को मिला कर तार सा बना कर दिखाया और मैं आश्चर्यचकित रह गयी- यह कहां से आ गया.. मुनिया में तो बस पानी जैसा पेशाब ही निकलता है।
वह हंसने लगी- अब बड़ी हो जा लाडो… वह जवान होने से पहले तक निकलता है। जवान होने के बाद पेशाब और रस दोनों निकलता है.. लड़कों को भी और लड़की को भी।

“और करो.. अच्छा लग रहा था।” मैंने सिसकारते हुए कहा।
“बस यह जो अच्छा लगना होता है न यही मुनिया की खुजली होती है। अकेले ही मजे लोगी क्या… मुझे भी तो दो। उस दिन देखा था न राशिद को मुझे रगड़ते, सहलाते, चूमते-चूसते.. बस वही सब तुम करो। मेरे लिये राशिद बन जाओ, फिर मैं तुम्हारे लिये बन जाऊंगी।”

मेरे मस्ती से सराबोर दिमाग को झटका सा लगा और मैं उसे देखने लगी जो मंद-मंद मुस्करा रही थी।
चलो ऐसे ही सही…

अब वो लेट गयी और मैं अपनी दोनों टांगें उसके इधर-उधर करके उस पर लद गयी और ठीक उस दिन के अंदाज़ में उसे रगड़ने सहलाने लगी। मैंने महसूस किया कि उसके दूध मेरे दूध के मुकाबले थोड़े नरम थे, शायद इस्तेमाल के बाद यह फर्क आता हो.. मैं उन्हें यूँ दबाने लगी थी जैसे कोई स्पंजी बॉल दबा रही होऊं और साथ ही उसकी घुंडियों को भी ऐसे चूसने लगी जैसे बच्चा दूध पीता है।

साथ ही बीच-बीच में दांतों से भी कुतर रही थी हल्के-हल्के, कि उसे तकलीफ न हो.. यह उसने भी किया था और मैं उसे वही लौटा रही थी जो उसने मुझे दिया था।

लेकिन वह मेरी तरह पड़ी न रही बल्कि उसने भी साथ में मुझे रगड़ना सहलाना शुरू कर दिया और अब सूरतेहाल यह था कि हम दोनों बहनें ही एक दूसरी को मसल रही थी, सहला रही थी और एक दूसरे के दूध पी रही थी।

फिर करीब छः सात मिनट बाद उसने मुझे अपने ऊपर से हटाया- बस अब बहुत चिकना गयी मेरी मुनिया… तू ऐसा कर कि नीचे बैठ। हाँ ऐसे और यूँ अपनी दोनों उंगली पूरी अंदर घुसा दे।
अहाना भारी सांसों के बीच न सिर्फ बोली, बल्कि उसने मुझे बिठाते हुए अपने दोनों पैर मेरे इधर-उधर कर लिये और दो उँगलियाँ फ्लैट अंदाज़ में दिखायीं।

मैंने वैसा ही किया और उसके मुंह से तेज़ सिसकारी सी निकल गयी।
जबकि मुझे ऐसा लगा था जैसे उसकी गर्म भाप छोड़ती योनि में ढेर सा लसलसा पानी भरा हुआ था जिसमे मेरी उंगलियाँ तर होतीं गहरे में उतर गयीं थीं।
“अब तेज़ी से अन्दर बाहर कर!” उसने फिर सिसकारते हुए कहा।

मैंने वैसे ही किया और वो “आह… ओह…” करती तेज़ी से सिसकारते हुए अपने दूध मसलने लगी. थोड़ी ही देर में उसका चेहरा तपने लगा और आँखें भिंच गयीं। फिर अजीब सी नज़रों से मुझे देखते हुए मेरा हाथ रोक दिया।

“अब इस बड़े वाले बैंगन को ले और अपनी ढेर सी लार इसपे लगा के इसे अंदर घुसा दे!”

एकदम से मेरे मुंह से निकलने को हुआ कि इतना बड़ा बैंगन भला कैसे घुसेगा लेकिन फिर मुझे उस रात की बात याद आ गयी कि कैसे राशिद ने इसी बैंगन के साइज़ का अपना लिंग इसी योनि में घुसाया था।

किसी बहस का कोई मतलब ही नहीं… मैंने वही किया। मुंह में ढेर सी लार बनायी और उसे उस बैंगन पर मल दिया। वह चमकने लगा और तब अहाना के इशारे पर मैंने उसे अपनी उँगलियों की जगह अहाना की योनि में घुसा दिया।

मुझे डर लग रहा था कि उसे तकलीफ न हो लेकिन उसे तो लगा जैसे मज़ा ही आ गया हो, उसने जोर की ‘आह…’ के साथ अपनी आँखें बंद कर लीं और मुट्ठियों में बेड की चादर भींच ली। मैंने बैंगन को डंठल तक घुसा कर देखा कि वह कहाँ तक जा सकता है।

और यह बस एक सेंटीमीटर ही बचा था बाहर… फिर उसके निर्देशानुसार मैं उसे अंदर बाहर करने लगी और वह ‘आह… आह…’ करती फिर अपने दोनों दूध मसलने लगी।

फिर एकदम से उसने मुझे गिरा लिया और मेरे ऊपर लद कर मुझे चूमने रगड़ने लगी। उसकी योनि में ठुंसा बैंगन ठुंसे-ठुंसे मेरे हाथ से छूट गया। वो मेरे चूचुक चुभलाने लगी, दूध मसलने लगी और एकदम फिर मेरे दिमाग पर नशा तारी होने लगा।
“सुन.. तेरी झिल्ली फट चुकी है या नहीं?” अहाना ने उखड़ी-उखड़ी साँसों के दरमियान कहा।
“पता नहीं… मुझे नहीं पता यह सब!”

उसने बेड के साइड की दराज़ से एक कपड़ा निकाल लिया और मुझे सरहाने से सटा कर खुद मेरी फैली हुई टांगों के बीच औंधी लेट गयी और अपने उलटे हाथ से मेरी योनि ऊपर की तरफ से फैला कर अपने सीधे हाथ की बिचली उंगली से योनि के ऊपरी सिरे को सहलाने लगी।

मेरे दिमाग में चिंगारियां छूटने लगीं।

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पेशाब करने वाली जगह में इतना अकूत आनंद हो सकता है। एकाध बार मैंने उकडूं बैठ कर और नीचे शीशा रख के अपनी योनि को अंदर से देखने की कोशिश की थी लेकिन उसकी बनावट ही मेरी समझ में नहीं आई थी।

अलबत्ता इतना समझ सकती थी कि योनि में ऊपर की तरफ जो हुड सा उभरा हुआ मांस रहता है, इस वक़्त अहाना वही सहला रही थी और मेरे नस-नस में इतना गहरा नशा फैल रहा था जिसे मैं शब्दों में ब्यान नहीं कर सकती थी।

इसी मज़े के बीच अहाना ने अपनी उंगली एक झटके से मेरी योनि के अंदर उतार दी। मेरे नशे को एक झटका सा लगा और मुंह से हल्की सी चीख निकल गयी.. ऐसा लगा था जैसे कोई सरिया सी मेरी अंदरूनी चमड़ी को छीलती अंदर भुक गयी हो।

मैंने तड़प कर उसकी उंगली निकालनी चाही लेकिन उसने मेरे पेडू पर दबाव डाल मुझे ऐसा करने से रोक दिया।
“चुपचाप पड़ी रह पागल… तेरी सील तो उंगली ने तोड़ी तो तुझे ज़रा ही तकलीफ हुई और मेरी सोच.. मेरी सील इस बैंगन जैसी मुनिया से टूटी थी लेकिन फिर भी मैंने बर्दाश्त किया था न… हम लड़कियों को यह बर्दाश करना ही होता है।”
“ऐसा लग रहा है जैसे चाकू घुसा दिया हो।”

“भक.. चाकू पहले घुसवाया है क्या जो उसका तजुर्बा है? कुछ नहीं होता रे.. बस थोड़ी देर सब्र कर। अभी पहले से ज्यादा मज़ा आने लगेगा।”

मेरा सारा नशा काफूर हो चुका था, लेकिन अपनी बिचली उंगली अंदर घुसाये-घुसाये उसने उलटे हाथ के अंगूठे से वही रगड़न देनी शुरू की जहाँ पहले उंगली से सहला रही थी।
धीरे-धीरे नशा फिर चढ़ने लगा।

उसके कहने पे मैंने अपने दूध और घुंडियों को अपने ही हाथों से मसलना शुरू कर दिया. मेरी योनि के ऊपरी सिरे पर उसके अंगूठे की सहलाहट वापस उसी अजीब सी तरंग को जिंदा कर रही थी, जो पहले टूट गयी थी।

धीरे धीरे नशा चढ़ता गया और दर्द पर हावी होता गया.. फिर एक दौर वह भी आया कि दर्द काफूर हो गया और रह गया तो बस मज़ा।

अब अहाना धीरे-धीरे उंगली अंदर बाहर करने लगी.. कोई बहुत ज्यादा नहीं, बस डेढ़-दो इंच तक ही अंदर बाहर कर रही थी लेकिन इतने में भी मुझे गज़ब का मज़ा आ रहा था।

“क्यों री… अब समझ में आया कि मुनिया की खुजली क्या होती है और यह कैसे मिटती है?” बीच में अहाना की आवाज़ मेरे कानों तक पहुंची लेकिन मैंने बोलने की ज़रुरत न समझी।

मैंने महसूस किया कि अब खुद बखुद मेरे मुंह से वैसी ही “आहें…” उच्चारित होने लगी थीं जैसे थोड़ी देर पहले अहाना के मुंह से निकल रही थीं और शरीर की एक एक नस में मादकता से भरपूर ऐंठन भारती जा रही थी।

कहानी कैसी लगी, इस बारे में अपने विचारों से ज़रूर अवगत करायें.. मेरी मेल आईडी है
imranrocks1984@gmail.com
imranovaish@yahoo.com


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